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मजबूरी से मज़बूती
झाड़ी सरदई, मंजरित मंजर। धीरे-धीरे बेर रसीले, पक गए बेख़बर। खाने वाले उस खा़ना पहुंचे, अपनी -अपनी डगर। बेरों से ज्यादा कांटे, है क�
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तेरे हर प्रश्न का उत्तर है
तेरे अंतःकरण में उठने वाले हर प्रश्न का उत्तर है प्रकृति में संसार में तेरे आसपास घटती हर एक घटना में धर्म ग्रंथो में इसीलिए उठो और जा�
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छन-रे-छन ब्रह्मांड में- खेल न्यारा-न्यारा
यह अविनाशी आत्मा रूप शरीर रे, यह अद्भुत मानव तन देव दुर्लभ रे, छन-रे-छन ब्रह्मांड में खेल न्यारा-न्यारा... ये देह को उम्र आत्मा तो अमर रे
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अपने आप को ढूंढ
"अपने आप को ढूंढ- ईश्वर साक्षात्कार योग यही!" -मोती
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अपने आप को ढूंढ
"अपने आप को ढूंढ- मानव जीवन के मूल उद्देश्य, की पूर्णता है!" -मोती
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अपने आप को ढूंढ
"अपने आप को ढूंढ- परमात्मा की अति कृपा का, फल मानव शरीर है!" -मोती
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अपने आप को ढूंढ
"अपने आप को ढूंढ- इससे बड़ा खोज तुम्हारे लिए, इस संसार में नहीं है!" -मोती
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हुँ। मैं गुमनाम
हुँ। मैं गुमनाम मुझे गुमनाम रहने दे। ना कर बदनाम थोड़ा मेरे नाम तो रहने दे। मिला हुँ।मै अब खुद से थोड़ा मेरे ये गुमान तो रहने दे। हुँ�
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ज़ालिम जींदगी
ज़ालिम जींदगी हमें ये गम दे गई। हमें मुकदर में कई बेहिसाब सितम दे गई। नम है ये आंखे इन आँखों में मेरे ख़्वाबों को ले गई मुकमल ना हुआ जो �
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ईश्वर एक है
"सिर्फ विचारों का मतभेद है- किंतु मनुष्य की आंतरिक सत्ता में, ईश्वर एक है!" -मोती
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घाट के किनारे
आज हमारे पास लिखने के लिए कोई कहानी या कोई कविता नहीं है।आज हम हमारे भाव इस रचना में उड़ेलना चाहते है।जिंदगी बहुत ही विचित्र पहेली है �
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आ ले चलू तुम्हे खवाबो के शहर मे
आ ले चलू तुम्हे ख्वाबो के शहर मे जहा रहती है परी कोई राजमहल मे मखमल सी कोमल अजिज जमी होती है सुकून जाना पहचाना गम ए दर्द अजनबी होती �
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