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Uday singh kushwah

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My Articles

मैं बीज हूं ,खाक में मिलकर अपने आप को मिटाकर ही बडा़ बनूंगा यू.एस.बरी read more >>
गर साथ देती तो जरा, सफर आंशान हो जाता, बहुत मुश्किल होता है सफर अकेले तय करना जिंदगी का ! यू.एस.बरी ग्वालियर मध्यप्रदेश read more >>
कभी तुम से_ तो कभी अपने आप से दिल की गहराई से, मिला करतें हैं! हर रोज, वनाया करतें हैं सपनों का महल, हर रोज गिराया करतें है! यू.एस.बरी ग्� read more >>
वो अर्द्ध देती उपासना -सी वुद्ध की विपासना-सी वो स्त्री ही तो है...! यू.एस.ब� read more >>
अलग -अलग तरहें की जरीन नक्काशी कढे़ वर्तन ,सिंगारदान खुद खाला के लड़के ने बनाई!तरह-तरह के रंगबिरंगें कांच लगे,महेरी,चौकी,फूलदान देने � read more >>
आखरी खत-1 उसने एक बार फिर बावर्चीखाने में बडे़ करीने से रख्खी लहसुन प्याज की टोकरी को उतारकर;उसमें रख्खें मल मल के कपडे़ के नीचे से चा� read more >>
मिलन... जागकर रात विताऊं , या ...यूहीं लौट जाऊं, कैसे कहूं ये चांदनी, तुझे कैसे पास बुलाऊं., तुझसे मिलने को आतुर मैं, खुद के साये से डर जाऊं read more >>
विस्तार... कहीं किसी रोज उस किनारे के उस पार वजती है सुमधुर ध्वनि, र्कणप्रिय लिए विस्तार करती मन के संताप दूर शनै शनै...! जब भी उठती ह्द� read more >>
तुम्हारे हिस्से की वह हरी,पीली, लाल, काली,चूड़ियों के वे टुकडे़ आज भी रखे है ...! तुम्हारे लिए... जिनके लिए तुम लड़जाया करती थीं, अपने तेज read more >>
ढलती शाम...शीर्षक कौतुहल से दूर ढलती संध्या , समेटती प्रकृती अपने करतलों को...! घर जातीं गाय धूल उडा़ती , बछडो़ को पाने सुख रभांती ..! आसम� read more >>
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