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कविताएँ
बेहद प्रेम उसी से क्यों होता है-जो नसीब में नहीं होता
बेहद प्रेम उसी से क्यों होता है जो नसीब में नहीं होता क्यों किस्मत हमें इतना रूलाती है और जो हमारा नहीं है उसी को सामने क्यों बार - बा�
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धरती मां की बात है निराली-सदियों से ये हमसब को है पाली
धरती मां की बात है निराली, सदियों से ये हमसब को है पाली। ममता की जी अदभुत खजाना है, इनसे से ही दुनिया है चल रही। ग्रहों में जो सबसे उत्त
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माय तुझी आस माझ्या बोलीतून
*माय तुझी वानी माझ्या बोलितून* आईचे रूप स्मरावे अन डोळा यावे पाणी. नि सूर तिचा आठवता का हळवी व्हावी गाणी!! हा सुंगध येतो मजला त्या सात
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उड़े ए-आवारा मनमौजी बादल देखो
उड़े बादल- मनमौजी है ए-आवारा, सुखा कहीं बाढ़- फिरता है ए-आवारा,, नाना रूप हैं- जगत में खुशी कहीं गम, नाचे कहीं- किसान हैं देखो कहीं गम,,
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दुःख भरी आसूँ-मुझे बड़ा दुःख होता है
तेरे आंसूओं को बहता देख मुझे बड़ा दुःख होता है । किस चीज की तुम्हे जरूरत है । मुझे जान कर और भी दुःख होता है । मैं चाहता हूं वो वस्तु त�
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जीवन की आस-जब तक सांस में सांस है समझो अभी भी आस है
हर दिन चमकता सूरज, हमको यही बताता है। काली रात हो चाहे, कितनी घनी, फिर उजाला आता है। हार जाओ अगर, लाखों बार, प्रयास करो, फिर भी लगातार। ज�
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मेरा गाँव-वो सुन्दर हमारे खेत खलिहान जो बताते हैं हमारी पहचान
मेरा गाँव वो छोटा सा मेरा गाँव जिसमें चलते हमारे पाव वो सुन्दर हमारे खेत खलिहान जो बताते हैं हमारी पहचान पेट की भुख वाली आग
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कावळ्यांचा पडलाय मोत्यांवर डाव
सांडली पेणातली शाई मला भरता येत नाही, सरपंचा विषय काही बोलता येत नाही. गावात कामे नाही होत आता तस्तीची , गा*त शब्द मोडतो यांचा मस्तीची.
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पिता पर्वत के समान होता है- बाहर से कठोर अंदर से मुलायम होता है
पिता एक पर्वत के समान होता है बाहर से कठोर अंदर से मुलायम होता है झुक जाता है तुम्हारी ख्वाहिशों के लिए क्योंकि उसको तुम्हारी ब�
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मनमानी किसकी चली नहीं किसी का यार
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,नहीं किसी का यार। ऐसों को हो हाल यह,सदा मिली है हार।। सदा मिली है हार,�
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त्याग रखें अभिमान को-मन में हो अनुराग
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,बड़े बड़े हो ढ़ेर। हर कुछ का है दायरा,माने जो वह शेर। त्याग रखें अभिमान
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रावण थे अति वीर-उसको था वरदान
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" रावण थे अति वीर,चली कभी न मनमानी। उसको था वरदान,दिए शिव थे जो दानी।। हुआ उसे अभिमान,हरण कर आ�
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