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खुशियाँ घर में नित रहे गौरव मय है माथ-बड़े भाग्य की बात है, मातु पिता हैं साथ
(दोहा छंद) खुशियां घर में नित रहे, गौरव मय है माथ। बड़े भाग्य की बात है, मातु पिता हैं साथ।। बड़े भाग्य की बात है, मनुज वंश में जन्म। सदा
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समय बड़ा दृढ़ है गुरू-देय तजुर्बा खास
(दोहा छंद) समय बड़ा दृढ़ है गुरू, देय तजुर्बा खास। बढ़े ज्ञान की धार तब,लिखता हूं इतिहास।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_सम�
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करिए सदा प्रचार सभी को हो अब शिक्षा-शिक्षा का सम्मान कर
(कुंडलिया छंद) शिक्षा का सम्मान कर, देंगें दृढ़ परिणाम। करें देश को सबल सब, होत जगत में नाम।। होत जगत में नाम,सदा गौरव में भारत। घर घर श�
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होत जगत में नाम-सदा गौरव में भारत
(रोला छंद) होत जगत में नाम,सदा गौरव में भारत। घर घर शिक्षित आज,शुद्ध रखिए हर आदत।। जिएं जिन्दगी खास,ज्ञान का लें अब भिक्षा। करिए सदा प्
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शिक्षा का सम्मान कर देंगे दृढ़ परिणाम-करें देश को सब जगत में नाम
(दोहा छंद) शिक्षा का सम्मान कर, देंगें दृढ़ परिणाम। करें देश को सबल सब, होत जगत में नाम।। शिक्षा का सम्मान हो,सबको हो यह ध्यान। घर घर श�
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छू लूं मैं आकाश-अपना बल है एकता हर बाधा कर नाश
(दोहा छंद) अपनी अपनी सोच है, रखूं नजरिया साफ। गुण को सदा कबूल कर,करता हूं इंसाफ।। अपना बल है एकता, हर बाधा कर नाश। आगे ही आगे बढूं, छूं ल�
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मुझे कहना है-उन लोगों से जो रोकते हैं क्या मिलता है जिसे जो करना है करने दो
मुझे कहना है उन लोगों से जो रोकते हैं टोकते हैं खींचते हैं क्या मिलता है जिसे जो करना है करने दो कहने दो क्यों तकलीफ है किसी के बढ़न�
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पूरी श्रद्धा से बस जाओ-आओ मेरे मन में
एक आश न थी टूटी एक आश बनाने आये तुम एक कुसुम खिला था मन का एक और खिलाने आए तुम। तुम हमको ढूंढ रहे हो हम हदय तुम्हारा मांग रहे हैं। जो क�
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राम
राम
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मेरे पापा-वे अभी भी हमारी हौंसला बन कर खड़े हुए हैं
मुझे देख कर पापा के आंखों में आसूं भर आएं हैं। मां तसल्ली रखे हुए हौसला संभाले हुए हैं। खाने के लिए मां मुझे तोते की तरह समझाया करतीं ह�
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हे एकदंत- हे गजमुखा हे लंबोदर हे विनायका
हे एकदंत! हे गजमुखा! हे लंबोदर! हे विनायका! मुझ अज्ञानी की आह सुन हे गणाधिपति गणनायका!! मेरे जीवन की विभावरी में विधु सा धवल प्रकाश हो
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मेरा प्रश्न-बना हृदय में प्रश्न आज मेरा भविष्य कैसा होगा
हूँ व्यथित आज मैं सोच के यह, कि कल क्या, कैसा, क्यूँ, होगा? क्या जो है आज, वही कल होगा? या फिर भाग्य ही मुह मोड़ेगा? मेरे उर की उथल पुथल
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