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कविताएँ
निडर नारी-न्याय खुद को दिलाएंगे
बहुत हुआ अन्याय अब, न्याय खुद को दिलाएंगे। बहुत बन गए हम नारी बेचारी, अब दुर्गा बनकर दिखाएंगे। बहुत जी चुके हम डर- डर कर, अब निडर बन क�
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पापा-पापा से ही मेरी जन्नत है
पापा है तो जिंदगी रंगीन है पापा है तो सपने हसीन है पापा है तो खुशियों के दिन है पापा है तो असान हर कठिन है लाख शुक्र खुदा जो तेरी रहमत ह
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माँ है तू जग मे सबसे प्यारी
कविता ("माँ है तू जग मे सबसे प्यारी") ममता की मूरत हो तुम भगवान की सूरत हो तुम, तुम हो जीवन में वरदान बिन तुम्हारे जहां वीरान, मां है त
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बरसात-रिमझिम रिमझिम बरसात हुई है
रिमझिम - रिमझिम बरसात हुई है, बादलों से मुलाकात हुई है। बूंदों से आज बात हुई है, हरियाली की सौगात हुई है। बिजली की चमकार हुई है, आज पहल
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तुम लौटकर आना-जब शाम होने लगे
जब शाम होने लगे, पंछियां घोसलें में लौटने लगे। जब सूरज ढ़लने लगे, तब प्रियतमा तुम लौटकर आना। जब मेरी बेताबी बढ़ जाए, तुम्हारी यादों का स�
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क्या राम बना कोई - सजाया मंदिरों में
क्या राम बना कोई ? राम को तुमने सजाया मंदिरों में, राम को तुमने किताबों में लिखा। पात्र सारे जीवित रहे, टेलीविजन के चित्रपट पर, पढ़ा ग�
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रंगभूमि -जमी हुई थी रंगभूमि
जमी हुई थी रंगभूमि, शोभित दिग्गज दीप्ति से दमक रहे। मानों एक साथ नभ में, कई सूरज चमक रहे। स्फार रश्मियाॅं स्फुटन से, अंबर आभा -सी फूट रह�
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कुछ पा ली है मंजिल कुछ अभी बाकी है
चल रही हूँ जिन्दगी के कंटीले रास्तों पर कुछ पा ली है मंजिल कुछ अभी बाकी है कभी हसीना कभी एक पहेली सी लगती है ये जिंदगी कभी पकाऊ कभी उ�
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खोट आहे जे तू सांगतोस
खोट आहे जे तू सांगतोस, कि प्रेम नाही करत, खोट आहे जे तू सांगतोस, कि प्रेम नाही करत, तरीपण.. लपून मला पाहतोस... जर हे खरय... तरं का मनाला र�
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स्वयं का ज्ञान मानवता का आधार है
मानवता स्थापित हो, इसके लिए- आदिकाल से लोग लगे हैं..! आज तक- मानवता स्थापित नहीं हुई..! तो जनाब जरा सोचिए, जब तक ख़ुद में- मानवता स्थापि�
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फक्तं मैत्रिण बनून राहिलीस तू-एका अनोळखी व्यक्ती
एका अनोळखी व्यक्ती सारखी आलीस तू , वृद्यात स्वप्नाच घर बनउन गेलीस तू . जणू काही क्षनाचा बस चा प्रवासच घडला, तुझ्या सोबत चा, तुझ घर आल आण�
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बालासोर की दुर्घटना-हुआ रवाना यमपुर को
बालासोर की दुर्घटना रेलयान गन्तव्य छोड़कर हुआ रवाना यमपुर को कैसे लिक्खूँ मुसाफिरों के मर्म भेदी क्रन्दित सुर को? क्या-क्या सपने
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