आज व्यक्ति और समाज
दु:ख के घनघोर अंधेरों में है ।
कहीं दु:ष्कर्म है
तो कहीं लूटपाट है ।
कहीं हिंसा है
तो कहीं मान _अपमान है ।
कहीं जात _ प read more >>
मैं गोबर भी छू लेती हूं,
गईया भी धो लेती हूं,
मैं खेतों में,दिन भर काम करके,
धूप भी सह लेती हूं,
मैं किसान की बेटी हूं.....
इतनी मेहनत करके भ read more >>