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सुरमा और काजल
ना लगा एक ऑख में सुरमा, और एक ऑख में काजल तू। गर कसूरवार है दो तो संतोष, तो फिर सजा एक को आखिर क्यों।। क्या बन्द पड़े हैं मुख तुम्हारे ,
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दुराचारी
चरित्रवान भला वो कैसे, भला कैसे वो स्वाभिमानी थे । जिसने धोखे से हरण की हो सीता, भला कैसे वो महाप्रतापी थे ।। जिसने अपने स्वार्थ के ख�
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* पक्षी *
* पक्षी * पक्षी तुम कितने अच्छे हो ऊंचाइयों को छू सकते हो। ऊंचाइयों पर उड़कर पक्षी गर्व नहीं तुम करते हो ।। राग द्वेष नहीं मन में तेर�
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मां का पल्लू
पल्लू से मां, पसीने को पोंछती। गर्म भाप पल्लू से, जख़मी अक्षि को सेंकती। मां पल्लू से, मुंह करती साफ़। गीला कर सिर पर रखती, जब बढ़ जाता त
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सही चुनाव
दोस्तो जागो और सुनो नया इतिहास बनाने का । सारे दल के हर पहलू हर भाव को अजमाना है किसने तुमको दिया कितना इसको अब पहचानना है सत्य राह पर �
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तू किताब होती तो
तू किताब होती तो पढ़ के जान लेता अक्षरों के लिखाबटों से पहचान लेता कोहचान से अंशार या अंशार से कोहचान बना लेता मैं लकीरें पढ़ पता न�
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मन चाहे चिड़िया हो जाऊं
मन चाहे चिड़िया हो जाऊं दूर दूर नदियों में जाऊं शीतल अमृत में चोंच डुबोऊ स्वर्ण रेत पर ठुमक ठुमक इतराऊ मन चाहे चिड़िया हो जाऊं। दूर �
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महफिल में कमी ना थी
महफिल में कमी ना थी, दोस्तों की लेकिन । चंद दुश्मनों से जाकर, कुछ दोस्त मिल चुके थे ।। वे जो नजरे मिलाने से भी, कभी कतराते थे हमसे । सा
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दीपदान
दिव्य ज्ञान रूपी हो यह प्रकाश, अंधकार मुक्त जग ये सारा हो । हो दीपदान का प्रचलन , जिससे रौशन जहॉ ये सारा हो ।। ना हो ऊँच नीच का भेदभाव, �
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परिस्थितियाँ अभी अनुकूल नहीं
परिस्थितियॉ अभी अनुकूल नहीं, खामोश लबों को रहने दो । वो जो उड़ रहे सिध आसमॉ के, अभी उन्हें खुले आसमान में उड़ने दो ।। सत्य तो आख़िर सत
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ढोंग
ढोंग बड़े मुझ ढोंगी में, स्वयं कर मैं देवी पूजा । और विरोध उनका मैं करता, जो करते मूर्तिपूजा ।। कलश स्थापना मैं घर में करता, करता विध�
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मत छूओ छाया को
मत छूओ छाया को अब बिखर जाने दो/ इन काले बादलो को आसमान में उड़ जाने दो, मत छूओ छाया को अब बिखर जाने दो/ तिन - तिन बिखरती इन गर्मियों को आ�
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