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प्रतीक्षा
तरस रहे नैना पिया मनवा अकुलाए सावन जस भीगी रतिया फूलन झुलाएँ बिन झपके पलकें राह तके नैना मद भरा बसंत नहीं पतझर बन जाए मीत प्रीत प्य�
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सावन बिदाई
सावन बीता थम गए सेरे गरजे बादल भादो बरसे गौरी गई ससुराल पिया संग डालन से खुल गए झूले | अब सुनी गलियन कौन निहारे बरखा में सब बं
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सावन
किसलय सा तन है मेरा सखी आज यह कुंभ लाने क्यों लगा सावन की रिमझिम बरखा में है अंग अंग बल खाने लगा इसको मां की ममता समझूं या समाज ने रचा
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# अव्यक्त ...
# अव्यक्त ... हुआ बहुत ही धोखा , इसमें ऐसा ही होता ...! कहीं-कहीं रात चांदनी , कहीं अंधेरा होता ...! प्रेम ग्रंथ के पन्ने खोलूँ , लिख लूं अपनी �
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शीर्षक (दृढ़ निश्चय)
शीर्षक (दृढ़ निश्चय) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मंजिल यू ही नही मिलती आसानी से। मंजिल के लिये चलना पड़ता है। मंजिल के रास्ते है कई सह�
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बचपन
ना हँसना एक बहाना था ना रोना किसी से छिपाना था ना थी कोई जरूरत, ना कोई जरूरी अफसाना था वो बचपन का मौसम भी कितना सुहाना था.. गिरकर उठना, �
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नश्वर काया
नश्वर है जब तेरी काया बंधन में मन क्यों लगाया पाई- पाई धन जो तूने जोड़ा संग अपने क्यों ना ले पाया समझा जिसको तूने अपना चिता पर उन्हों
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जीवन में क्या क्या देखा
एक गरीब को छूपते छूपाते देखा मैने लेकर सौ रुपए ब्याज पर रोते रुलाते देखा मैने ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ घर की हालत ठीक नहीं छत से पानी टपकते द�
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न राजाओं सा ठाठ
मोदी मोदी हर हर मोदी मोदी मोदी घर घर मोदी मोदी चाहें सब हो जाये बिगड़ी बात झट से बन जाये कभी न करता माफ़ दुशमन को मोदी मोदी हर हर मोदी �
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ये देश हैं हमारा
ये देश हैं हमारा हम इस के संतान हैं मेरा मुल्क हिदुस्तान हैं न दूसरा हमारा लडेगें अंतिम सांस तक न समझना बेचारा ये सहनशीलता हैं मुझ
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रक्तदान
कविता-रक्तदान जय जय रक्तदान हे! मानव धर्म-प्रान हे! मानव जान बचाता है तू, जीवन नया दिलाता है तू, जीवन दान कहाता है तू, प्रकृति
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बेटी की पुकार
मार गिराई जालिमों ने मैं चंद उम्र की बेटी थी कभी खेलती आंगन में कभी आंचल में लेटी थी। क्यों मार गिराए मुझे बस इतना बता दो इज्जत क्य�
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