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कास मुझे तुम सुन पाते
कास मुझे तुम सुन पाते अगर पुकार मेरी तुम तक पहुच पाती , कास मुझे तुम सुन पाते / कभी एक नजर उठाके तुम मुझे देख पाते कभी मुस्कुरा के तुम
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पर्यावरण पर कविता-छुईमुई
कविता-पर्यावरण पर कविता- छुईमुई एक बार की बात लगाया उस पौधे पर हाथ लजाई दूल्हन मानो रात पूछा कैसा शरम हयात मैंने क्या कर दी तेरे सा�
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जज्बे को सलाम ...
जज्बे को सलाम ... काम कोई छोटा नहीं , काम कोई बड़ा नहीं... है कोई रास्ता ऐसा जो , मुश्किलों से भरा नहीं... जज्बा छोटा या बड़ा हो , बंधनों से
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सावन की घटा
सावन की घटा हूं मैं घट-घट भर दूंगी। सागर के अधरों को छूकर चहुंओर निर्भय बरसूगीं।। संजोये हूँ आस,सखी मिलन की शिराओं की पीर टटोलूगीं।
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बेटियाँ किस रूप मैं मिलती है
बेटियाँ किस रूप मैं मिलती है | बेटियाँ कभी माँ के रूप मैं मिलती है, बेटियाँ कभी बहन के रूप मैं मिलती है| बेटियाँ कभी बहू के रूप मैं मिल�
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कोन हे वो चिड़िया
कोन हे वो चिड़िया जिसके हे ये रोते बच्चे/ क्या झाकने की इच्छा हे नीड़ो से क्या चलती हे हवा इन पेड़ों से, क्या, होगा मन उड़ने को शाम सव�
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मन चाहता है
मन चाहता है | चाँद पर बेठकर देखूँ आसमान में बिखरे तारो को अपने हातों से समेट कर देखूँ , मन चाहता है | बहते आशुओं से आसमान के बादलो को भ
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न मैं रोता
न तू होती न मैं होता न कभी मिलते न मुलाकात होती न दिल मिलता न प्यार होता न इश्क में हम बेकार होते न मैं रोता न तू हस्ती न जख्म देती
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आव्हान
आह्वान वक्त का ऐसा हुआ असर अमराई भी बौराई नहीं। तन मन से सींची थी बगिया कली मुसकाई नहीं।
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बेटी पर कविता-मन की मार
कविता-मन की मार बन अभिशाप जगत में बेटी मैं छिप कर क्यों जीवन जीती किसे सुनाऊं कौन सुनेगा किससे दिल की बात कहूं मैं?
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असहाय मुझे - अपने आप को खो दिया
असहाय मुझे अपने आप को खो दिया दैनिक आंखों के सामने खो गया परिचित दुनिया मुंह चावल मुंह की आवाज खींची जाती है जो तय नहीं करता है उस
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नर पर भारी नारी
*नर पर भारी नारी* अक्ल बाटने लगे विधाता, लंबी लगी कतारी। सभी आदमी खड़े हुए थे, कहीं नहीं थी नारी।। सभी नारियाँ कहाँ रह गई,
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