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हंसने की अभिलाषा है-एकबार हंसा कर देखो
हंसने की अभिलाषा है एकबार हंसा कर देखो मेरे मोती चुन चुन कर एक बार सजा कर देखो। सुप्त हो गयी लहरें तो जलधि कहां कहलाओगे अपनी लहरों म�
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मैं भूल गयी-उन पन्नों को जिसमें बस दर्द तुम्हारा था
मैं भूल गयी उन पन्नों को जिसमें बस दर्द तुम्हारा था कितना आंखों को धुलती जो हरदम बहती धारा था। जितना मैं स्वर्णिम सुख की आश किया करत
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गुरुपौर्णिमा-गुरू असतात यशाचे शिल्पकार
गुरुपौर्णिमा...🌷💫 🙏गुरू असतात यशाचे शिल्पकार गुरू देतात जीवनाला आकार... पावले असतात दिशाहीन त्याला मार्ग दाखविते बुद्धी गुरुंमु�
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मम गुरु-वदान्य प्रबल दृष्टांत सकल
वदान्य प्रबल दृष्टांत सकल ! एकांत शून्य सा चारु विदल!! मन से निश्च्छल् ध्वनि में तरुदल! वक्तव्य नाद सा करे विकल!! है तीक्ष्ण तेज जैसे �
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बछड़े कि हरकत-आंगन में उछल कूद
शाम का समय है बछड़ा घर से बाहर है।हर जगह खोजें लेकिन कहीं नहीं मिला। घर के सामने लगे निंबु के पेड़ के पास कुछ हिलने कि आवाज सुनाई दी। मा�
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अधिकार के लिए प्रखर होना होगा
(कविता छंद) अधिकार के लिए प्रखर होना होगा, हड़प वाले को जवाब देना होगा। अभी भी वक्त है जागो मेरे दीन, आगे बढ़ो अपनी बातों को रखिए। चुप
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अपने मन को कोसते-उनकी यह है रीति दीनों तक पहुंची नहीं
(दोहा छंद) अपने मन को कोसते,उनकी यह है रीति। दीनों तक पहुंची नहीं, जीवन की सब प्रीति।। दीनोंं तक पहुंची नहीं,सुमन खुशी की आस। दोषी किस�
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दीनों तक पहुंची नहीं-जीवन की सब प्रीति
(दोहा छंद) बड़े बड़े होते चले,इनको मिले न मुक्ति। दीनों तक पहुंची नहीं, सब साधन की युक्ति।। दीनों तक पहुंची नहीं,जीवन की सब प्रीति। अप
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दिनों तक पहुंची नहीं-उनकी जो है चाह
(दोहा छंद) दीनों तक पहुंची नहीं,उनकी जो है चाह। खा जाते हैं बीच में, और दिखाए राह।। दीनों तक पहुंची नहीं, दिए हुए खैरात। लोकल नेता खा गए
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रहे सितारे दृढ़ सदा-झिलमिल रहती शांति
(दोहा छंद) रहे सितारे दृढ़ सदा,झिलमिल रहती शांति। अपनी अपनी धारणा,वैसी ही हो कांति।। अपनी अपनी धारणा, अपनी अपनी चाल। वैसा ही परिणाम ह�
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मिले खुशी तब आपको-जीवन भर हो प्यार
(दोहा छंद) मिले खुशी तब आपको, जीवन भर हो प्यार। अपनी अपनी धारणा,रखें हृदय उदगार।। अपनी अपनी धारणा,वैसी ही हो कांति। रहे सितारे दृढ़ सद
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समझे जो सब मर्म को-पाते हैं अनुराग
दोहा छंद) अपनी अपनी धारणा,से चलते हैं लोग। चाहत को जो जन रखे,करते हैं सब भोग।। अपनी अपनी धारणा, अपनी अपनी राग। समझे जो सब मर्म को,पाते �
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