कुछ सवाल है, कह सकती हूं कि बस यूँही, लेकिन क्या सच में बस यूही है, नही यू ही कुछ भी नही है। सालो से चला आ रहा, देखा गया, सुना हुआ है सब ।और सा� read more >>
(दोहा छंद)
बेकाबू जब मन रहे,चले न कोई जोर।
देते रब को दोष तब,रखे भावना चोर।।
चले न कोई जोर तब,मन की जब हो बात।
पहले ही हम भाँप कर,कर लेते ख read more >>
(रोला छंद)
चले न कोई जोर, करे मन हरदम अपना।
फिर भी अपनी सोच, पूर्ण करना है सपना।।
रखता सदा विवेक,तभी रहता मन काबू।
चलता अपनी राह, कहे मुझक read more >>
( मुक्तक छंद )
जीवन के अब यार क्यों, बिगड़ गए सुर ताल।
आओ कुछ मंथन करें,करिए खत्म बवाल।
महँगाई की मार से,कमर गई है टूट_
खोए अपने में सभी,बढ� read more >>