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कोरे कागज पर नाम लिख दिया हमने-तू ही तू समाया है दिल में
कोरे कागज पर नाम लिख दिया तेरा, तू ही तू समाया है दिल में, मेरे दिल पर ऐतवार हो गया है तेरा।
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वो रुठे तो मेरी जान निकल जाती हैं-ना हो बात उससे दिल घबराता है
वो रुठे तो मेरी जान निकल जाती हैं, ना हो बात उससे दिल घबराता है, जब वो मुस्कुराता है तो , जान में जान आ जाती हैं।
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परिवर्तन-जीवन में परिवर्तन अवश्य करें परंतु एकदम अचानक से कोई नया प्रयोग ना करें
जीवन में परिवर्तन अवश्य करें परंतु एकदम अचानक से कोई नया प्रयोग ना करें हर व्यक्ति मानसिक रूप से परिवर्तन की आवश्यकता महसूस करता है ल�
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स्वयं को समय दें-अपने आप को निराकार बनाएं साकार बनाएं
हमेशा सबकी नजरों में ना आए दिखने वाली योजना बनाकर आप खुद को दूसरों के सामने अपने आप को निशाना बना लेते हैं दूसरों को दिखाने के बजाय आप ख
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जीवन मरण-जीवन रूपी यात्रा में कहां विश्राम मैं पाऊंगी
जीवन रूपी यात्रा में कहां विश्राम मैं पाऊंगी !यह तो मुझे पता नहीं है! चंद लफ्जों में मेरी बात कहां सिमट ने वाली है! अपने शब्दों में इस
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सावन जल बरसे अभी-चमक रही है दूब
(मुक्तक छंद) सावन जल बरसे अभी, चमक रही है दूब। हरी चुनरिया ओढ़कर,धरती लगती खूब। काले बादल मस्त है,वसुंधरा है मग्न_ जो देती है अति खुशी,च�
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कलकल चंचल जल दिखे-बांध हुआ है भग्न
(मुक्तक छंद) कलकल चंचल जल दिखे, बांध हुआ है भग्न। बरसे सावन झूम के,सभी नदी जलमग्न। मस्त सरकार सो रहे,आनन फानन काम_ सड़कों का भी लय बुरा,ज�
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तुम मुझे वोट दो-बदले में नोट लो
चुनाव प्रचार जोरों पर था, मंत्री जी को असीम डर था। कहीं इस बार कुर्सी फिसल न जाए, सत्ता हाथ से निकल न जाए। जगह- जगह प्रचार पे, नेता जी �
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अपनों से मिलना रहे- मन में अति अनुराग बरसे सावन झूम के
(मुक्तक छंद) अपनों से मिलना रहे, मन में अति अनुराग। बरसे सावन झूम के,लगे रंगीन बाग। भक्ति माह है यह अभी,भक्ति भाव में लोग_ भोले की महिमा
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बरसे सावन झूम के-लाया दिव्य निखार रग रग में है प्यार
(मुक्तक छंद) बरसे सावन झूम के,लाया दिव्य निखार। पुरुष स्त्री सब सौम्य है, रग रग में है प्यार। जलमय जलमय है यहां ,पानी में है जोश_ भींग भी
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भीनी भीनी हैं खुशी-हरी चुनरिया ओढ़कर सजे हुए हैं फूल
(मुक्तक छंद) भीनी भीनी है खुशी, समय हुआ माकूल। हरी चुनरिया ओढ़कर,सजे हुए हैं फूल। सजे सजे सब नवदिखे,भूमि बनी महबूब_ लोगों में है अति खुश
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वसुन्धरा है मग्न-हरी चुनरिया ओढ़कर धरती लगती खूब
(मुक्तक छंद) हरी चुनरिया ओढ़कर,धरती लगती खूब। सावन जल बरसे अभी,चमक रही है दूब। काले बादल मस्त है,वसुंधरा है मग्न_ जो देती है अति खुशी,चा
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