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राजनीति बन बैठा, अब रुपये का कारोबार पार्टियों के दफ्तर बन गए है बाजार । आज राजनीति ग्लैमर और फ़ैशन है, बस इससे रूपये का कनेक्शन है।। � read more >>
भूख सब्जी जलती है कड़ाही का दोष है नहीं, आंच का दोष है नहीं, चूल्हे का दोष है नहीं, व्यक्ति का दोष है नहीं, पेट का दोष है नहीं, भूख क� read more >>
कुछ बड़ा कर लूं सोचता हूॅं! जिंदगी में कुछ बड़ा कर लूं बूंद बूंद ही सही घड़ा भर लूं। चल पड़ी जिंदगी बढ़ चला मैं शादी हुई बच्चे ह� read more >>
થોડામાં જેને સુખ મળે, તેને કશું અધૂરું નથી, તૃષ્ણા જેના હૈયે વસે, તેને જગત પણ પૂરતું નથી. સોનાના મહેલો મળે, વૈભવના ભંડાર મળે, મનને શાંત read more >>
जिन्दगी एक सर्कल की तरह चलती रहती है। जो उससे थोड़ा भी बाहर हुआ। वह जिंदगी से ही बाहर हो जाता है। फिर वह अन्य दूसरे सर्कल या चक्र में पर� read more >>
मोहतरमा, जरा कम इतराया करें, अपनी अदाओं से हमें, इतना ना सताया करें। आपकी नशीली निगाहों में, खो ना जाएँ कहीं, तवज्जो हटाने के लिए काला स� read more >>
रब से रोज़ तेरी दुआएँ माँगा करते हैं, तुझे सामने ना माँगकर ख्वाबों में माँगा करते हैं। वहाँ तुम इजहार का इकरार अवश्य करना, क्योंकि...ख् read more >>
મહેનતની આગમાં તપે જે, સોનું બનીને રહે છે, કાંટાની કેડી વટાવનાર, ફૂલ બનીને રહે છે. ક્ષણભરનાં સુખની પાછળ દોડે જે મન અંધ બનીને, હાસ્ય હોઠ� read more >>
कहानी शीर्षक : सेवाभाव सविता की नजर दीवार घड़ी पर अटकी हैं I 2 बज चुके हैं I अभी तक उदय स्कूल से घर नहीं आया हैं I उसे 15 read more >>
चिता सजायी गयी लाश लिटायी गयी लाश ने चिता से पूछा- मुझे क्यों जलाती हो? क्यों राख बनाती हो? हंस कर चिता ने कही- तुम कहाँ जलती हो तुम तो अ read more >>
एक सवाल “ बांझ “ किसने बनाया यह शब्द, “भगवान” या भगवान के नाम पर “ इंसान ” किसने ? निश्चित किया - “ कोख “ से एक स्त्री की पहचान, नहीं उठी read more >>
मैं पढ़ूंगी पापा! मुझे नहीं चाहिए “ नयी किताबें” मैं पढ़ लूॅंगी “ पुरानी “ या मांगी हुई “ किताबों ” से, मैं नहीं देख पाती हूॅं मेरे ल� read more >>
तब तक ये चलता रहे, जब तक इसमें मैं जो मै इस से जुदा हुई, ये कुछ भी ना है read more >>
મોહબ્બતને હૃદયમાં જ છુપાવી રાખવી છે, આ લાગણીને દુનિયાથી બચાવી રાખવી છે. નયનની વાત નયનો જ સમજી લે તો પૂરતું, નિઃશબ્દ પ્રીતિને હૈયે વસ� read more >>
बहुत पहले की यह बात है। एक भिखारी था। दिन भर वह चल_चल कर भीख मांगा करता था। एक दिन कुछ अजीब सी घटना घटी। दोपहर के समय में वह किसी धूल भरी स� read more >>
एक समंदर प्यासा था रचना -प्रतिभा खडेकार एक समंदर प्यासा था, रेत महा जमीन सुक्खा था। लहरों ने तो घेरा किनारा, ना अंश शेष बचा था ओस। एक � read more >>
लहरों में दबा सच अलवर की सुबह धीरे-धीरे अपने रंग में उतर रही थी। अरावली की पहाड़ियों के पीछे से सूरज की पहली किरणें निकलकर शहर की पुरान read more >>
कहानी शीर्षक: खुशी के आँसू अमर बाजार से आकर खाना खाकर घर में सो गया I गर्मी का महीना था I कमरे में पंखा लगा हुआ read more >>
તારા પગલાંએ વસંતનો મંગલરાગ ગાઈ દીધો, હું પાનખરના પર્ણ સમ પવનમાં વિસરાઈ ગયો. ચાંદની પણ ભીની થઈ તારી સ્મૃતિના સ્પર્શથી, હું અશ્રુદીપ � read more >>
રહેલા ઘાવને બજારમાં શું કદિલમાં હેવું? દરેક દર્દને જગમાં ગવડાવી દેવાનું નથી. સુગંધ બનીને જીવવું હોય તો ફૂલ જેવું જીવો, કાંટાનો હિસા read more >>
દિલને દીપક સમું સળગવાની કળા આપી હતી, ને તને એ જ્યોતમાં ઘર કરવાની જગ્યા આપી હતી. તું જ વાદળ થઈને મારી ઋતુઓ લઈ ગઈ, મેં તો તારા રણને વરસવા� read more >>
एक - दूसरे की करे हम सहायता, जिससे प्रसन्न हो हमारे परमात्मा। मानवीय कर्म - कथा से मिलती है प्रेरणा, मानव को सुख पहुंचाने से मिलती है सर� read more >>
દરવાજા બે હતા, છતાં એક જ રસ્તો સામે હતો; મળવાનું નસીબ ક્યાં? સમયનો પહેરો સામે હતો. બારીમાં દીવો રોજ સાંજે ધીમે ધીમે ઝળહળતો, મારી આંખો સ read more >>
प्रकृति और मानव प्रकृति मुस्करा रही हैं, मानव पर तरस रही हैं। फूल भी खिल रहे हैं, पक्षी भी गा रही हैं। पेड़-पौधे झूम रहे है, तितलिय read more >>
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