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बगिया
शीर्षक। " बगिया" फिर बसंत आएगा अभी तो मौसम है पतझड़ का खिलेंगी कलियां बैठेंगे भौंरे आनंद उठाएं
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एक कदम लक्ष्य की और
शीर्षक। " एक कदम लक्ष्य की ओर" तू राही है इन गलियों का अभी कहा तू रुक जायेगा तलाश है जो तुझको मोती क�
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उम्मीद और आस खुद से लगाना
उम्मीद और आस खुद से लगाना, किसी के भरोसे जिंदगी ना चलाना, कुछ करना हैं अगर जीवन में, खुद की मेहनत पर ऐतवार हैं करना।
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आशाओं का रेखा पर
आशाएं है शून्य शिखर पर मन में कुछ सवाल हर मोड पर कुछ रुक जाना हर रास्ते पर पूर्णविराम जीवन अंधेरे में दीप �
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साहसी विद्यार्थी
"साहसी विद्यार्थी" अंधेरे से कमरे में एक मैं और एक मेरा सपना वो जलती मोमबत्ती वही पढ़ाई का टेबल
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बेरोजगारी
बीतते हुए साल में महामारी और रंजिशो के हाल में रिश्तों की टूटती डोर को आओ मजबूत करे इस नए साल में आशाओं जिम्मे
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सच्चा राही
"सच्चा राही" निकल पड़ा तू रास्ते पर मन में कुछ अरमान लिए दुनिया को अपना मान कर कुछ करने की अब ठा�
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ठंड की धूप
"ठंड की धूप" कुछ बादल काले काले कुछ पानी से भरे हुए है कुछ ढक लेते सूरज को धूप नही आ पाएगी ये बादल देखो कितन
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नए साल में सपनो की पहेली
"नए साल में नई पहेली सपनो की" फिर नया साल आया रिश्तों की टूटी डोर को मजबूत बनाने आया जो छोड़ गए जाने दो जो आ र
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हौसलों का घोंसला
" हौसलों का घोषला" हां मैं पंछी छोटी सी तिनका का घर है मेरा हौसलो से उड़ान है मेरी छोटा सा तो पंख है मेरा.
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मेरी कलम से
(1). साल का आखरी दिन है तुमसे मिलना ना-मुमकिन है दो-चार बरस और अभी हमें जीना तुम्हारे बिन है (2). सुलगते रिश्ते जल कर राख हो जाएँगे वो हमस�
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चेहरा
उसे दुर से देखा तो। उसका चेहरा था फुलों से खिला जब पास गया तो तेजाब से धुला
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