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Sudha Chaudhary
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Sudha Chaudhary
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सहज और सम्पूर्ण भाव से
क्यों झांक रहा मन मेरा? पथ में इतने कांटे थे मन में जितनी बातें सहज और सम्पूर्ण भाव से आंक रहा मन मेरा। बिजली के उर में तड़पने मानें
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मुझे कहना है-उन लोगों से जो रोकते हैं क्या मिलता है जिसे जो करना है करने दो
मुझे कहना है उन लोगों से जो रोकते हैं टोकते हैं खींचते हैं क्या मिलता है जिसे जो करना है करने दो कहने दो क्यों तकलीफ है किसी के बढ़न�
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पूरी श्रद्धा से बस जाओ-आओ मेरे मन में
एक आश न थी टूटी एक आश बनाने आये तुम एक कुसुम खिला था मन का एक और खिलाने आए तुम। तुम हमको ढूंढ रहे हो हम हदय तुम्हारा मांग रहे हैं। जो क�
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कहां निकालू-इस अटल विश्वास को
कहां निकालू इस अटल विश्वास को टूटते फूटते जो रच रहा इतिहास को। संभव है द्वंद मिट जाए न हो अवसाद इसका भेद से निकला हुआ तीर चुभ जाए हव�
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छूटा बचपन छूटीं यादें-छूट गई सब बुनियादे
छूटा बचपन छूटीं यादें छूट गई सब बुनियादे पथ छूटे पथरीली राहें आंगन की महकी दीवारें चंदा और चकोरे छूटे छूट गए सब साथी। मां छूटी पापा
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वेदना मय हो गई-वेदना से प्रीत
वेदना के सुर मिले वेदना के गीत वेदना मय हो गई वेदना से प्रीत। वेदना में दिन हुआ वेदना में रात वेदना सफर हुआ वेदना में बात वेदना मय ह�
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जाकर उसे जागाओ- जो कब से सो रहा है
जाकर उसे जगाओ जो कब से सो रहा है। मेरे खिलाफ जिसका सब चूर हो रहा है। बीती रागिनी का चंद ताल होकर, जमाने की रोशनी से दूर हो रहा है। फुर्�
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मेरे पथ की चाह यही है
मेरे पथ की चाह यही है, कहते जाना,बढ़ते जाना। जहां दिखाई दे कोई अपना, रहते जाना,सहते जाना। बन्द बन्द सारी परतें, यूं ही खुलती जानी है। अ�
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दूर से जिन्दगी गुनगुनाती रही
दूर से जिन्दगी गुनगुनाती रही , कभी पास आ मुस्कुराती रही। कब लगा तुम मिले मुझे इस डगर , चुपके चुपके ये खुशियां चुराती रही। उस विभा पार त�
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जीवन की फुलवारी से
खिलती है जीवन की कलियां, अनुराग भरी इस क्यारी से। कब, कौन छूट जाएं जीवन की फुलवारी से। जग में छाया है अन्धकार, जिसने रौंदा है बार बार।
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