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ग़ज़ल
इस कदर न बहा आशुओं को
इस कदर न बहा आशुओं को बेजुबान से इन कणो को कोई ना कोई होगा जानने वाला कोई ना कोई होगा समझ ने वाला.
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नुसरत _ ए _ मौहब्बत
नुसरत_ ए_ _मौहब्बत सबका साथ बांटने चला हूं। तकल्लुफ करके देखना जरा पहरों को आठ बांटने चला हूं। खुशामद तो मैंने बहुत की थी चांद _सूरज की
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लहजा
ये नरम लहजा प्यारी बाते तेरे लिए है हम इस लहजे में सबसे बात नही करते
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कौन समझाए ये इश्क को
तू आगे बढ़ क्यों गई पीछे मूड कर देख ली होती बेचारे इश्क़ को, बोल दिया होता पर डर था तुम्हारे मुस्कुराहट से की ओ ना चला जाए,, तेरी मुस्कान
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प्यार की अमानत
दिल ने लिखी एक इबादत है ताजमहल प्यार की अमानत है हृदय खिल उठा फूल .सा आपसे मिलकर आप आए बड़ी इनायत है फूलों का हार मेरे हाथ में तो नह�
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जमीं को थामे रखता हूँ तो हाथों से सितारे जाते हैं
गली गली हथकड़ियों मे बांध कर गुजारे जाते हैं सलीबों पे मसीहा आज भी टांग कर मारे जाते हैं खुद्दारों की लाशों पे पहले भरपूर नुमाइश होत�
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खामोश
सब कुछ शब्दों में बयां नही किया जा सकता हैं कुछ बाते खामोशी से भी समझी जा सकती है
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भूख
टीन टप्पर की वह बस्ती है। मौन बाँधे कोई हस्ती है। कौन पढ़ता इनकी लाचारी शाम कल के भ्रम में ढलती है।। भुखमरी की ये रोज अमावस बैठ काँधे
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कल मेरे बाद मुझे ही याद करोगी
कल खुद ही तुम खुद से फरियाद करोगी, देखोगी आईना जब मुझे ही याद करोगी। आज हूँ मैं तेरा तो मेरी कद्र नहीं है, कल मेरे बाद मुझे ही याद करोगी�
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दबी हुई हैं कई तहरीरें हमारी बस्तर के थानों मे
दबी हुई हैं कई तहरीरें हमारी बस्तर के थानों मे लाशें मांग रही हैं इंसाफ गली सड़ी बयाबानों मे आदिवासी हैं हम सदियों से बाशिंदे हैं जं�
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मुसीबतो से बढ़ना हे आगे
मुसीबतो से बढ़ना हे आगे होसलों से लड़ना हे आगे, कुछ बनके हे दिखाना कल क्या होगा किसने जाना/
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मरतबा इश्क़ का आज
कम हो गया है मरतबा इश्क़ का आज , जिस पर खुदा को था बहुत ज्यादा नाज़ । गर रहता मोईन, इश्क ए जुनून उधर अब भी सवार, तो यूं ही ख़त्म न होजाती दुनिय�
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