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फरमान मेरे गम दा
क्या लिखूँ , तुझ पर ऐ जिन्दगी ! तुने बडा सताया है , हर बार मेरे हिस्से का गम, मुझ पर ही क्यूँ फरमाया है ।।
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एक दिन एक नया खुददार
खुददारो का खुददार आया है, खुदा जाने , अब किसके हिस्से बेशुमार प्यार आया है ।।
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रब एक गम एक बार
लडखडा कर चलना , रब तेरी रजा है, अब मै कैसे मानूं , यह मेरे हिस्से दी सजा है ।।
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गौरेया
तपती दुपहरी और तेज धूप, छोटा सा आसियान मेरा भी है। आप के आराम के वक्त, मैं भी आई थी। तपती दुपहरी में सो रहे थे आप, मैं मुंडेर से पुकार कर
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पगड़ी रो भार
पगड़ी को भार, धरती स्यूं भी ज्यादा हुवै। कोई धरती पर रख देवै, कदी रखवाई जावै तो। देखी है जमीन धंसता... - राधेश्याम जोशी कोहिणा
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बूढीया री जूती
चालता जद चरड़ चरड़ करती, जाणै बां'रै हाडा स्यूं होड़ करै। टाबरिया नैं बूंटिया दिरा'र खुद, चापू लगवा लेता बोदी खाल रौ। पण हिम्मत री कमी �
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मां आखर सूं मुंह भर ज्यावै
मां आखर सूं मुंह भर ज्यावै, मां नै देख्यां मन हरसावै। मां रौ करज उतर ना पावै, फरज आपणो बढतो जावै। मां धरणी अर मां ही जरणी, पग-पग माथै दुख
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“हिस्सा ही सही”
किसी को अपनी पूरी दुनिया बनाना ठीक नहीं, वो साथ तो चले, मगर मेरी ज़मीन कहीं नहीं। रिश्तों की उड़ान हो खुली हवा की तरह, एक ही पर टिकी रहे
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मेरे हाथ दा नूर
खुदा तेरी रहमत दा नूर आया है , अब न जाने किसके हिस्से का गरुर , मेरे हाथ दी लकीरा बीच आया है ।।
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“हिस्सा ही सही”
किसी को अपनी पूरी दुनिया बनाना ठीक नहीं, वो साथ तो चले, मगर मेरी ज़मीन कहीं नहीं। रिश्तों की उड़ान हो खुली हवा की तरह, एक ही पर टिकी रहे
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कोई एक गम
ख्वाबो के किस्सो का मंजर आया है, खुदा ही जाने अब किसके हिस्से समंदर आया है ।।
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गम का लम्हा
गम को गम मिला, ऐसा भी क्या हुआ तुमको , जो हमको हम सा न मिले ।।
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