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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

चांद पाने के चक्कर में, लाखों सितारे खो गए। अहम् पाने के चक्कर में, हम वह हमारे खो गए। सिद्धि पाने के चक्कर में, पूरा जीवन खो गया। समझद� read more >>
मैंने तो बात की बात कही थी, तूने बात को क्या बात समझ लिया। तूने समझा सो समझा, मैंने तेरे मग़ज़ के मज़मून की, जात को समझ लिया। तुझे गिरान� read more >>
जमी हुई थी रंगभूमि, शोभित दिग्गज दीप्ति से दमक रहे। मानों एक साथ नभ में, कई सूरज चमक रहे। स्फार रश्मियाॅं स्फुटन से, अंबर आभा -सी फूट रह� read more >>
शब्द का प्रभाव और, वजन कम हो गया। कहता हूं पर कोई सुनता ही नहीं, मुझे खुद पर वहम हो गया। मेरे प्रभाव का परास, अब सिमट रहा है। खूब जमाने क� read more >>
पांच क़िस्म के लोग मिलते, निंदा बाज़ार में। कभी-कभी काम बिगड़, बहता निंदा भुजबल धार में। कब पूर्वाचल से चला रवि, फैली कब अस्ताचल लाली� read more >>
पिघल ममता मोम, रम स्वामिभक्ति रगों में घुल गई। निज सुत शोणित से, मां ममता परिभाषा बदल गई। चुटकी भर सैनिक, फ़रेबी फ़ौज से भिड़ गए। यहां read more >>
कली को स्वतः स्वच्छंद, ज़रा खिलने दो। खुद को खुद से, ज़रा मिलने दो। जो जैसा है, वैसा, ज़रा बनने दो। मन को मन की, ज़रा सुनने दो। तोड़ो, मर� read more >>
मृत्युभोज गंध पड़ी मंद, सरकार सरासर सख्त़। भोज भोग, प्रयोग वालों के, हुलिया हौसले पस्त। दिमाग़ सरणी में तरणी कर रही, मृत्युभोज विरोध� read more >>
विद्यार्थी को चाहिए, बैसाखी नक़ल प्रसाद की। ऑफिस में बैसाखी, बॉस आशीर्वाद की। राजकाज में बैसाखी, भाई- भतीजावाद की। जातिवाद की बैसाख� read more >>
प्रकृति के पंचांग में, शरद ऋतु है ख़ास। शुरू होते ही लगाते, अपने-अपने कयास। सजने- संवरने बैठती, लगते कार्तिक मास। धीरे-धीरे खुदरंग मे� read more >>
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