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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

धरती होगी ऊसर, आहा, आह‌‌ में बदल गया। लंबी दूरी नाप रहा, स्वार्थ- सीढ़ी से सफ़र। बढ़गी पैदावार होगी, गुण हेतु धरती बंजर। रिश्ते नात� read more >>
शेर को भी, मिलता है सवा शेर। ख़लक़ नहीं खाली, शूरवीरों से। पीरों का पीर, बड़ा पचपीरों से। फ़क़ीरों की शफ़क़, फीकी नहीं अमीरों से। ग्र� read more >>
यह है विषमता का जाम। पी -पी पागल हो रहे, दुनिया के लोग तमाम। जो गंवार हैं, वे शुद्ध गंवारू रूप में पीते हैं। पढ़े-लिखे थोड़ा, पानी मिला ल read more >>
साहब, सबकी पड़ती है पार। समय नहीं करता, किसी का इंतजार। वक़्त सब पर, करता है एतबार। जाते -जाते रह जाता, वही बनता सरदार। किसी के जाने से, read more >>
देखते- देखते, सब कुछ बदल गया। सुख -सुविधाओं के नाम पर, ज़माना छल गया। घरों में चूल्हों के लिए, काम आती थी मिट्टी। गैस चूल्हे ने जड़े जम� read more >>
हीरा हियस होता है, लुट जाने के बाद। परख होती है, सरक जाने के बाद। आंसू आंकलन होता है, बहाने के बाद। स्वाद याद आता है, बीत जाने के बाद। दिन read more >>
अरे नर मीठा -मीठा बोल, बोल का मोल बड़ा। कुछ मत दो, मीठा बोल दो, बोलने का फेर। सब कुछ दे दो, कड़ा बोल दो, किया- कराया ढेर। मीठे बोल से भरो ख़ज read more >>
उसके पूर्वज, सरपट दौड़ लगाते थे। अठखेलियों संग, शिकार करना सिखाते थे। दहाड़ से पूरा क्षेत्र, थर- थर‌ थर्राता था। कभी दुबक, कभी लपक, कभ� read more >>
नहीं मिले चाहे मोती लुटाओ, मिले तो टके की सेर। किसे, कहां, कैसे मिलेगी, है ये मन का फेर। एक दौलत की सेज पर, गोली खाकर सोता। दूजा कांटों क� read more >>
बस, वह तो ऐसा ही है। कहते बुझारत लोगों को, बहुत सुना है। लोगों ने उसमें क्या देखा, क्या चुना है? लोगों ने उसे खुद भूना, या वह खुद भुना है? � read more >>
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