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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

होने को तो सीधा, अपने पर आ बदल दे तख़्त। खुद का नहीं बदलता, औरों का बदल दे वक्त। है तो गूंँगा, बहरा, वक्त पर बोलना रक्त। ऐसे हार का हार, read more >>
एक था दीया, एक बाती। जीवन रोशन करते, बन जीवन साथी। दीये हिये प्रेम से, लवलीन बाती। हवा हलराती बातें करती, आती-जाती। दीया हिये से उ� read more >>
आती है तो आने दो, आना उनका काम। कसकर बांँध लो मुट्ठी में, क़दम लहरों के वाम। बन लहरी लहरों को, अपने कर लो नाम। हारा कहलाए बेचारा, चल व read more >>
समय, समय आने पर, सबकी गहराई नाप लेता है। समझ नहीं पाता कोई, समय जब चाप लेता है। समय सबका हिसाब, अपने आप लेता है। अर्श गिरे फ़र्श, समय � read more >>
तलवार से तीव्र, क़लम की धार। सह्य करवाल की, असह्य क़लम की मार। अंत में क़लम के, नीचे आती तलवार। क़लम की मार से, क़लम ही सकती उभार। क� read more >>
कोई परोसता, पानी मिला -मिला। कोई ख़ालिस पिलाता, कोई झूठ में झूठ हिला- हिला। कोई झूठ जाम परसता, चखना खिला-खिला। कोई कैसे भी परोस देता, read more >>
सत्य, न्याय, नियम, भीड़ बाढ़ में बह जाते हैं। वही सत्य समझ जाता, जो मूढ़ मुंड कह जाते हैं। भीड़ के रेले से, संहत शजर ढह जाते हैं। भीड़ � read more >>
सोना, तू क्यों नहीं रहा सोया? कच्ची नींद जागकर, कहांँ से कहांँ गया? सोना, तू सपने में आता। हाथ नहीं आए, दूर भागता। जब -जब, तू जागा, ग़ read more >>
सत पथ पर रत, टक्कर जीवन उद्देश्य से। स्व संजात परदा उठे, क्षमता रहस्य से। सलिल में अनल लगा दे, टक्कर चुग़ली तलब से। स्वार्थ चुग्गा च read more >>
सरसर तरणी तैरती, गहरी झील के सीने पर। गद्गद मद के गद के गद से, खुद के किश्ती होने पर। मुझे सरूर, इसका टूटा ग़रूर, विवश जीवन जीने पर। ए� read more >>
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