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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

हे तेजस्वी, तुम युग के शक्ति आधार। इस युग को बदल दो, संभालो स्वयं ही पतवार । तुम चाहो तो ज़र्रे ज़र्रे से पानी निचोड़ दो। है सामर्थ्य read more >>
कोशिश सभी करते हैं, पर कोई जीता कोई हारा। खेल कई खेलते हैं, पर होता है एक सितारा। जीतने के लिए, लक्ष्य की हो मज़बूत पकड़। पूरा करने के ल� read more >>
कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिक, कई शत्रु सैनिकों को हताहत करता हुआ, अंत में घायल होकर धरती पर गिर जाता है तथा पवन के माध्यम से वह अपने घर � read more >>
कर्म से बदले तक़दीर। जैसे उड़ते बादल की, बदले राह समीर। कर्महीन नर का जग में, जीना है बेकार। अलि अलविदा कहेंगे, जब हो कंटीली बार। रात read more >>
तेल, नमक, लकड़ी, चीज याद रह गई तीन। जीता -जागता मनुष्य, बनके रह गया मशीन। खाना- पीना, उठना- बैठना, सबकी रेल- पेल। भौतिकता की चकाचौंध ने, बि� read more >>
यदि दुनिया दुलहन, तो माथे की बिंदिया है जयपुर। यदि दुनिया चमन, तो सुमन की कलियां है जयपुर। यदि दुनिया रंगीन, तो गुलाबी नगरिया है जयपुर� read more >>
चक्कर है साहब, पड़ ही जाता है। राई का बन जाता पहाड़, गढ़ी बन जाता है गढ़। पाठा का नाटा बन जाता, पहाड़ का बने कंकड़। मकड़ी फंसती मकड़ -जाल, read more >>
चिलचिलाती धूप में लू के थपेड़ों के बीच पसीने से तर -बतर चिथड़ों में लिपटी एक बूढ़ी -सीऔरत अपने दो बच्चों के साथ सड़क किनारे बैठी भीख � read more >>
हां, ज़माना बदल रहा है। यह,समाज को छल रहा है। बच्चे, दादा-दादी के, सानिध्य में रहते थे। एक था राजा, एक थी रानी, किस्से सुनते थे। बहन, बेटी � read more >>
कांच के कंगूरे, कांच की दीवार। रहने वाले कांच के, कौन करे पत्थर से वार? इस दुनिया में कांच के, चिरक ढांस हैं घर। रहने वालों में, अजीब -सा स read more >>
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