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कविताएँ
ये पत्तों की टहनियों से
#पतझड़ ये पत्तों की टहनियों से जुदा होने का मौसम है। तन्हा छोड़ उन्हें हवाओं में बह जाने का मौसम है। ये पतझड़ है। गम की नम आंखों से झांकत
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“घर से हौसला”
मिट्टी का चूल्हा कहता है— बेटा, रोज़ जलना पड़ेगा, तभी घर में उजाला आएगा। रोटी बोलती है— पहले खुद पकना सीख, फिर दुनिया को भूख मिटाने क
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ज्ञान का दीप यदि न जलेगा
जिंदगी में रहेगा अंधेरा ज्ञान का दीप यदि न जलेगा न मिटेगी गरीबी मुसीबत हर कोई जब तलक न पढ़ेगा, जिंदगी में रहेगा अंध�
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एक फूल मिला
एक फूल मिला, जो कुछ मुझसे कुछ दूर मिला। जिसमें लगा कुछ धूल दिखा , जो मुझसे रूठा बैठा मिला। मिला रूठा मुझे एक डगर में, अकेला बैठा सुन सन श
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दुश्मन की शामत आई थी
दुश्मन की शामत आई थी, जो पहलगाम पे वार किया। निहत्थे लोगों का दुश्मन ने नरसंहार किया। बहनों का सिंदूर उजाड़ा, सबका कत्लेआम किया। भो�
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गूढ परी
काठावर साडी झुलते, पावलांशी ताल जुळे, काळी-सावळी कांती तिची, नजरेतच अर्थ खुले. नाकात नथ चमकते, हास्यात गोडसा सूर, काळे केस मोकळे, वाऱ्य
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धुणी
बरसती ठंडी धुंध में आग री ओट, मिनख रो सहारो हुवै। बुढ़िया सिंझ्या खेत सूं आई पाछै, पाळै मांय रोज तपै। बैठक जमती जोरगी चिलम री सट्ट में
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बचपन मुझे याद आता है
बचपन के खेल खिलौने याद आते हैं, बचपन के दोस्त साथी याद आते हैं। बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी, निस्वार्थ बेमतलब थी अपनी यारी। धर्म जा�
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खुद से बातें करना अच्छा लगता है
कभी-कभी खुद से बातें करना अच्छा लगता है, तन्हा राहों पर अकेला चलना अच्छा लगता है। जिंदगी की भाग दौड़ में खुद को इस कदर भूल चुका हूं मैं,
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"उत्थान"
“सुबह तो रोज़ होती है… सूरज हर दिन उगता है… पर सवाल ये नहीं कि दिन कब निकला— सवाल ये है कि इंसान कब जागा? भीड़ में चलना आसान है, पर खुद
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नभ के राही
नभ के राही तु सुन मुझको ले चल उस पार जहाँ उड़ के तु जाता है लेने प्यार दुलार । नभ ही है वो घर तेरा नभ ही तेरी जान नभ में ही विचरण करें न
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उलझन एक शिक्षक की।
उलझन में पढ़ा शिक्षक परीक्षा नजदीक आए, पाठ्यक्रम को समय नियम से पूरा न कर पाए, लगी छुट्टी अतिवृष्टि की बच्चे स्कूल भूल जाए, निकाल समय श
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