महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 19 Jun 2026 कहानियाँ हास्य-व्यंग #सरकारी अस्पताल #महेश्वरउनियाल 262 0 Hindi :: हिंदी
‘‘सरकारी अस्पताल’’ सरकारी अस्पताल भारत की एक अनोखी संस्था है, जहां पर लोग अपनी बीमारी को ठीक करवाने के लिए जाते है, किन्तु होता क्या है, कि जो लोग एक बीमारी को लेकर जाते है वे वापसी में चार और बीमारी लेकर आते है। मरीज के साथ वाला व्यक्ति जो भर्ती हुए मरीज के साथ रहता है दो दिन बाद खुद भी भर्ती हो जाता है, बैड तो इतने पुराने होते है कि पुरानी पैसेंजर रेलगाड़ी की सीट जान पड़ते है। पर्ची बनाने को ऐसी लम्बी कतार लगी रहती है कि मरीज कतार में ही धड़ाम से गिर पड़ता है, फिर आपातकालीन वार्ड मे ं भर्ती करवाना पड़ता है। मरीज डाक्टर के पास ये उम्मीद लेकर जाता है कि मेरी जांच पड़ताल की जायेगी किन्तु इतनी भीड़ में डाक्टर मरीज की शक्ल देखकर ही दवा लिख देता है और उसके बाद वीमारी पूछता है। कुछ मरीज भर्ती हो जाते है तो वार्ड में जेल से भी खतरनाक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जहां हाथ पर सुई लगायी जाती है, वहीं नर्स द्वारा सचेत किया जाता है कि यदि हिला तो देख लेना फिर। मरीज अपनी बीमारी से कम, वार्ड के कर्मचारियों के उत्पीड़न से ज्यादा भयभीत रहता है। डाॅक्टर तो केलल टहलने के लिए ही आते है, पर जो डाॅक्टर भर्ती करवाता है वह तो ईद का चांद हो जाता है, अन्य डाॅक्टरो ं से पूछने पर बताया जाता है कि तुम्हारा डाॅक्टर तो कोई और है। गर्मी के मौसम में तो क्या कहना सरकारी अस्पताल का अलग ही रोमांच रहता है वार्ड में पंखे तो लगे होते है, किन्तु चलते नहीं है, पर जो चलते है उनको भी हाथ से धक्का देेना पड़ता है, ऐसा लगता है कि मरीज की सारी बीमारी इन पंखों को लग गयी है। कभी-कभी तो मरीज आपस में गत्ते व रुमाल से हवा करते रहते है। यदि किसी को टायफायड का बुखार हुआ है तो, भर्ती होने पर इतने मच्छरा ें द्वारा खबर ली जाती है कि मलेरिया, डेंगू का बुखार उपहार में मिल जाता है। एक बात जो सबसे अच्छी लगती है, वह है मरीजों का आपस में भोजन के लिए एक दूसरे को पूछना। कई लोगों की तो इन्हीं अस्पतालों में दोस्ती और शादी तक की सैटिंग हो जाती है। अगला भयानक दृश्य शौचालय का होता है, जहां पर सीट टूटी पड़ी होती है किन्तु पानी की टोंटी चलती रहती है। दरवाजे पर कड़ी नहीं होने के कारण एक हाथ से दरवाजा पकड़कर रखना पड़ता है, फिर भी बाहर से आने वाले मरीज को यकीन नहीं होता है और लगातार दरवाजा पीटता और धक्का देता रहता है, और अन्दर वाले को जोर लगाना पड़ता है। मरीजो को दिया जाने वाला नाश्ता तो इतना स्वादिष्ट होता है कि दूध के साथ ब्रैड होते है जिनमें काॅकरोच और मक्खियां स्वाद लेते है, मरीज तो केवल देखकर उल्टी करता है। असली घटना तो तब घटती है जब ब्लड की जरुरत पड़ती है, ब्लड बैंक वाला केवल यही डिमाण्ड करता है कि मुझे ‘‘खून के बदले खून’’ चाहिये, तब ये समझ नहीं आता है कि यह व्यक्ति मरीज का इलाज करेगा या फिर मरीज को आजादी दिलायेगा। इतनी सारी खूबियां होने के बाद भी आज भारत में गरीब और असहाय लोगो ं के लिए ये अस्पताल किसी संजीवनी बुटी से कम नहीं है, जहां पर हर वर्ग के लोग विशेषज्ञ डाॅक्टरों के द्वारा अपना इलाज कराते है और प्राईवेट अस्पतालों की महंगी फीस व खर्चे से बच जाते है। सरकार को चाहिये, कि इन अस्पतालों मंे विशेषज्ञ डाॅक्टरो ं के साथ ही साथ उच्च कोटि की सुविधाएं उपलब्ध करायी जाऐं ताकि भारत के नागरिकों को अनावश्यक बीमारी के कारण होने वाली मौतों से न जूझना पड़े। लेखक- महेश्वर उनियाल 7579155644