महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 19 Jun 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत 236 0 Hindi :: हिंदी
‘‘मेरा पहला प्यार’’ नया जीवन शुरु हुआ बाद बचपन खो जाने के सोच बदलनी शुुरू हुई बाद प्यार हो जाने के। प्यार को समझना बड़ा मुश्किल था लेकिन करने को बेताब मेरा दिल था वह एक समुद्र थी और मै साहिल था नजरों से ही उसकी बस मै घायल था। महीना वह सावन का था जब आंखों से आंखें लड़ी दिल तो हिलौरे मार रहा था जब वह परी सी सामने खड़ी थी। घर से मै दूर था वह भी घर से दूर थी मै तो डर से चूर था पर वह दिल से मजबूर थी। एक दूजे को कहने से हम घबराया करते थे किन्तु कहे बिना अब हम रह नहीं पाते थे। एक दूजे के आस-पास से हम गुजर जाते थे आंखों ही आंखों में हम सब बातें कर जाते थे। सहसा हमने एक दूजे से दिल की बातें बोल दी प्यार भरी मिठास हमने सांसो में घोल दी ये दुनिया तो बस हमने अपने प्यार में तौल दी । प्यार हमारा अब आगे बढ़ा बढ़ते ही परवान चढ़ा अरमाना ें के आयने में था यह स्वच्छंद खड़ा। आते-जाते, मिलते रहना सब बातें अब खुलकर कहना सब कष्टों को मिलकर सहना मोतियों से जड़ा जब यह मुहब्बत का गहना। चांदनी वाली रात में हम सितारे देखा करते थे अमावस की रात में हम निकलने से डरते थे। साथ बीते पलों को हम अब कभी न भूलेंगे इस बात पर चर्चा होती थी बिछड़ने की बात पर वह, हमेशा फूट-फूट कर रोती थी। मोती सी आंखें, लम्बे से बाल थे गुलाबी ओंठ थे, मखमली गाल थे सुन्दरता की दस देवी से भी हमारे कुछ सवाल थे कारण इसके हम दोनों आपस में खुशहाल थे। उसके घर तक बात नहीं थी, मेरे घरवाले भी अन्जान थे बता नहीं सकते थे उनका, बस इस बात से परेशान थे। वर्षा की रिमझिम बूंदे जब उस पर गिर आती थी, छूकर उसके प्यारे तन को खुद ही फिसल जाती थी। दूर हुुए थे कुछ पल के लिए वह अपने घर आ जाती है कुछ पग मार्ग चलने पर वह सहसा रूक जाती है। रूकते-रूकते ऐसे ही वह नीचे झुक जाती है। अन्तिम सांसो में वह अब कुछ नहीं कह पाती है सच्चे प्यार की यह दासतां बस उसके दिल में रह जाती है। मोहब्बत की इस बहार में सहसा एक आंधी आ जाती है प्यार के चमकते इस दीपक को जग से उड़ाकर ले जाती है। दुनियां से उसके जाने पर, बस मै यही सोचा करता हूॅं कि क्या मै अपनी बाहांे में फिर से उसको झुला पाउंगा अब जिन्दा तो नहीं शायद मर के ही उसे भुला पाउंगा। रचनाकार- महेश्वर उनियाल 7579155644