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राही-ख्वाब मेरी मंजिल के मुझे ना दिखा
ख्वाब ,मेरी मंजिल के ,मुझे ना दिखा। मैं हुँ , ,राही निकला हुँ, मे एक अनजान , सफर पर जानता हुँ, करते है काँटे हिफाजत अक्सर फुलों की कली�
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आठ पहर-एक पहर खुली आंखों से सपना तुम्हारा
एक पहर खुली आंखों से सपना तुम्हारा अगले पहर यादों की झांकियाँ, एक पहर शुद्ध लिखता जाता तुम्हें अगले पहर ढूंढू उसमें गलतियाँ। एक प�
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मैं हूँ एक टीचर-मेरी नजर रहती है हर बच्चे पर
मैं हूँ एक टीचर मेरी नजर रहती है हर बच्चे पर, मैं पढ़ाता कभी व्यंजन तो कभी स्वर, किताबों में उलझा रहता हूं अक्सर, कभी कक्षा १ तो कभी कक्ष
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सीख-घरोंदे को इमारत में बदलकर तो देखो
सीख घरोंदे को इमारत में बदलकर तो देखो, ख्वाब को हकीकत में बदलकर तो देखो। पिंजरे की सलाखों में है उड़ने की राह भी, गुलामी को बगावत में ब
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लक्ष्य की ओर चल'-जिन्दगी गुजर रही है वक्त निकल रहा है
"लक्ष्य की ओर चल" जिन्दगी गुजर रही है, वक्त निकल रहा है। खड़ा हो यों अनमगा तूं क्या कर रहा है।। डूब मत सोच में लक्ष्य की ओर चल। लौटकर नह�
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मैं क्या करूं तुम जीत ना पाओ-मैं क्या रोकूं तुम चल पाओ
मैं क्या सोचो तुम सुन पाओ मैं क्या रोकूं तुम चल पाओ। मेरा अंधकार पुराना है जीने का मतलब नाना है सौ बार कहो हर बार कहूं मैं क्या खोऊं ज
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माँ - बाप को कभी भूलना नहीं
माँ - बाप को कभी भूलना नहीं माँ - बाप को भूलना नहीं भूलो सभी को, मगर माँ-बाप को भूलना नहीं। उपकार अगणित है उनके, इस बात को भूलना नहीं ।।
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जिंदगी-जिन्दगी की राह में आशा और निराशा है
जिन्दगी जिन्दगी की राह में आशा और निराशा है, मिलकर बिछुड़ जाना ही जीवन की परिभाषा है। जीवन में फल पाने के लिए श्रम करना पड़ता है, ईश्व
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महिला क्यों घूँघट में जिए-जब तूफां में मझधार में जलते रहें दीए
महिला क्यों जिए घूँघट में जब तूफां में मझधार में जलते रहें दीए, तो आज की महिला क्यों घूँघट में जीए। अशिक्षा के अंधकार में नारियाँ सो�
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झरोखे से-पुराने झरोखे में आज फिर परछाई दिखाई दी
ये क्या? पुराने झरोखे में आज फिर परछाई दिखाई दी लगता है उन्हें आज फिर मेरी याद आई थी।
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उनकी शादी अभी नई हुई है-पर्दा करने की आदत नही हुई है
उसकी शादी अभी नई हुई है। पर्दा करने की आदत नही हुई है। उसने देखा मुझे तो वो मुश्कुरा उठी, लगता है उनकी ये आदत अभी गई नहीं है। @babaji dikoli
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उनकी बेबफाई को जो याद करते है-तो शराब की तलब उठती थी
उनकी बेबफाई को जो याद करता था तो शराब की तलब उठती थी। उनके सामने जाने में भी मुझे शर्म लगती थी। पर वहाँ जाना हमारी मजबूरी थी। क्योकि य
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