"रूहानियत के लिए",
वो नूर (ईश्वर) मेरे भीतर है, मैं (अहं) मानती नहीं है
रूह रोज़ अपने रब के सजदे से चूकती है।
इश्क खुदा की जात है इश्क कि ड� read more >>
नदी जब समंदर में मिलेगी तो खारी हो जाएगी,
चाँद जब जमीन पे उतरेगा तो दाग हो जाएगा,
तुम छुपकर घर में रहते हो,
अच्छा है उसी में रहा करो,
जब � read more >>
मुझे लगता है , मैं और मेरी सोच हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं! शायद इसका कारण हमारी भावनाएं और हमारी सोच दोनों का अलग-अलग होना हैं , नहीं ऐसा भ� read more >>