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कितना पढ़ोगी किताब
जब पढ़ना शुरु किया जीवन का अर्थ समझ आया नई दिशा नई उमंग की ओर बढ़े कदम चारों ओर।। कभी कुछ वक्त मिला ही नहीं कुछ अलग किया ही नहीं बस कित�
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दिल बसता है गाँव में
कविता शीर्षक : दिल बसता है गाँव में आ गए शहर में रहने लगे फ्लैट में लेकिन आज भी दिल बसता है गाँव में I मुर्गा का बाँग देना, कोयल क�
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हादसा और विवाह
बहुत पहले की बात है राम सौगार्थ नाम का एक व्यक्ति मुंबई में रहते थे। पेशे से वे एक कांट्रेक्टर थे। बहुत सारे कंपनियों में उनका कांटेक्
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प्रकृति और मानव
प्रकृति और मानव प्रकृति मुस्करा रही हैं, मानव पर तरस रही हैं। फूल भी खिल रहे हैं, पक्षी भी गा रही हैं। पेड़-पौधे झूम रहे है, तितलिय
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खुशी के आँसू
कहानी शीर्षक: खुशी के आँसू अमर बाजार से आकर खाना खाकर घर में सो गया I गर्मी का महीना था I कमरे में पंखा लगा हुआ
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भिखारी से राजा
बहुत पहले की यह बात है। एक भिखारी था। दिन भर वह चल_चल कर भीख मांगा करता था। एक दिन कुछ अजीब सी घटना घटी। दोपहर के समय में वह किसी धूल भरी स�
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मैं पढ़ूंगी
मैं पढ़ूंगी पापा! मुझे नहीं चाहिए “ नयी किताबें” मैं पढ़ लूॅंगी “ पुरानी “ या मांगी हुई “ किताबों ” से, मैं नहीं देख पाती हूॅं मेरे ल�
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एक सवाल - बांझ स्त्री पर कविता
एक सवाल “ बांझ “ किसने बनाया यह शब्द, “भगवान” या भगवान के नाम पर “ इंसान ” किसने ? निश्चित किया - “ कोख “ से एक स्त्री की पहचान, नहीं उठी
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चिता पर लाश
चिता सजायी गयी लाश लिटायी गयी लाश ने चिता से पूछा- मुझे क्यों जलाती हो? क्यों राख बनाती हो? हंस कर चिता ने कही- तुम कहाँ जलती हो तुम तो अ
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सेवाभाव
कहानी शीर्षक : सेवाभाव सविता की नजर दीवार घड़ी पर अटकी हैं I 2 बज चुके हैं I अभी तक उदय स्कूल से घर नहीं आया हैं I उसे 15
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“કર્મની છાપ”
મહેનતની આગમાં તપે જે, સોનું બનીને રહે છે, કાંટાની કેડી વટાવનાર, ફૂલ બનીને રહે છે. ક્ષણભરનાં સુખની પાછળ દોડે જે મન અંધ બનીને, હાસ્ય હોઠ�
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"તૃષ્ણાનું મૃગજળ"
થોડામાં જેને સુખ મળે, તેને કશું અધૂરું નથી, તૃષ્ણા જેના હૈયે વસે, તેને જગત પણ પૂરતું નથી. સોનાના મહેલો મળે, વૈભવના ભંડાર મળે, મનને શાંત
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