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लगता है इंसान होना पाप से है कम नहीं
लगता है इंसान होना पाप से है कम नहीं तार है इंसानियत इंसान को है गम नहीं क्या सही है क्या ग़लत न तौलता इमान को मार कर इंसानियत को पालत�
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छप्पर वाले यार पुराने आंगन में
छप्पर वाले.... छप्पर वाले यार पुराने आंगन में औस टपकती रात सिराहने आंगन में चादर में ढकता हूं तन जैसे तैसे कैसे सोऊं रात बिताने आंगन मे
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क्यों तरसता तरसता सा है आदमी
"क्यों तरसता तरसता है आदमी", इस बड़े शहर की क्या कहूं दास्तान ना पेट में खाना है ना है सर पे मकान तन पे कपड़े नहीं सामने है दुकान कैसे ज�
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मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता
"मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता" मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता यूं ही जिस ओर देखता हूं, दर्द में डूबे लोगों की "आह" जब भीतर उतरती है निकाल लाती है व
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"શબ્દોનું સામર્થ્ય"
ક્યારેક હળવા ફૂલ છે, તો ક્યારેક ઘા કરી જાય છે, આ શબ્દો જ છે જે શ્વાસમાં ધબકાર ભરી જાય છે. નથી હોતું કોઈ શસ્ત્ર કે નથી હોતી કોઈ ધાર એમાં,
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मुसलसल
मुसलसल जिंदगी बहती चली नदी के वेग सी कोई परिंदा दरख़्त पर बैठा हुआ मुझको देखता है मैं किसी कीड़े की भांति पत्ते पर बैठा किनारा खोजता
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दोबारा
उम्र भर पछतावा करने से अच्छा है, दोबारा से कोशिश की जाए, और सारी ताकत फिर से झोंक दी जाए।।
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"હપ્તે મળતાં સપનાં"
ક્યારેક કરિયર તો ક્યારેક જવાબદારી નડે છે, મધ્યમ વર્ગને સપનાં પણ હપ્તે હપ્તે જ મળે છે. આ લોકલ ટ્રેનની ભીડમાં જે ચહેરો થાકેલો છે, એ જ મ�
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मेरी दौलत—पापा की बदौलत
मेरी दौलत—पापा की बदौलत मेरे पापा कभी सख़्त हो जाते हैं, कभी सरल हो जाते हैं, मैं इस बात से हैरान हूँ, वक़्त के साथ-साथ कैसे वो हर वक़्त
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"સ્વીકાર"
જીવનની આ ઘટમાળમાં ક્યારેક થંભી જવું પડે, વહેતા પવનની જેમ બસ, ક્યાંક વહી જવું પડે. નથી હોતો ઉકેલ હર વખત આ હાથમાં આપણા, આથમતા સૂરજની જે�
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"અતીતથી પેલે પાર"
અતીતના એ ખંડેરોમાં હવે વસવાટ શા માટે? વ્યર્થ વીતેલી ક્ષણોનો આટલો ઉચાટ શા માટે? નવું આકાશ આંબવા, જરા પાંખો ફેલાવી જો, પછી આ સીમાઓની બ�
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चेहरे पे लगे चेहरे हजार हैं
हमने भी देखे अपने हजार है अपने के भेष में छिपे सारे गद्दार हैं.... देखकर मुश्किल हैं ये कह पाना...... कौन कितने वफ़दार है...... चेहरे पे लगे चेह�
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