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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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निश्चय कर त्रिशूल उठा
निश्चय कर त्रिशूल उठा वार कर संधार कर अंगारों सा जल रहा ज्वला बन धधक रहा अज्ञानी अनुशंधान से जोत जला सोच जगा निश्चय कर के चलना होग�
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तेरा गोद - रूप निहारु रंग तिहारो
रूप निहारु रंग तिहारो छुप छुप पाउ प्रेम तुम्हरो! सूरत तेरी ममता मूर्तियां मैं हारू पर जित तिहारो!! न मन में द्वेष न भीतर विरोध बस हृ
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समाज
समय से आगे भागना हैं अभी और जागना हैं ! दौड़ के बादल छू लेना हैं अभी एक और आशमा बनाना हैं !! तारों की दुनिया में छा जाना हैं अभी चाँद पे �
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छेड़ने लगा हैं
बदल रहा आशमा के रंग भी थोड़ा थोड़ा जैसे लिख रहा अम्बर नाम अदना अदना ! कौन हैं जो स्वर्गलोक में बना रहा रास्ता परिंदो के घर जो उजाड़ रहा थ�
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रोज थोड़ा थोड़ा इश्क़ में
बे खबर मगरूर सितमगर जालिम निर्दई सनम रोज थोड़ा थोड़ा इश्क़ में कतरा कतरा नहाया कर ! अपने बेजान जिस्म को चुपके से भिगोया कर फिर इश्क़ क�
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जीने के लिए लड़ना होगा
घाब भी अपना दा ओ भी अपना जो दिया वो हाथ भी अपना ! हवा के रुख मोड़ दो या नव के दिशा बदल दो जीने के लिए लड़ना होगा या फिर जीना छोड़ना होगा !! ए
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मुलाकात होती
मुलाकात होती तू होती तो कुछ बात होती नजरों से नजरों की मुलाकात होती ! रूह रूह से मिलता हमारी मोहब्बत साकार होती !! तू होती तो हमारा �
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रात के तन्हाई में
रात के तन्हाई में आश्मान में चाँद तारे और सितारें जग मग जग मग टीम टीम करता जुगनू बहु तेरे! मदहोशी में मदहोश अलवेला अल्हड मौसम वसंत�
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अकड़
किस बात कि अकड़ हैं जो इतना तू अकड़ती हैं! शीशे का तेरा बदन हाथ लगे तो टूट जाएं किस बात की रोष हैं जो इतना तू धधकती हैं!! मैंने तुम को दे�
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आधुनिक संसार हैं
समाज के जंजीर में बंधा वेडियों में चुपचाप जकड़ा न टूटता न तोड़ पाता समाज के मिथ्या इजाद ! सत्य पे असत्य का बोल बाला जबरजस्त हैं टुकड़ो
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