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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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इश्क़ की कोई बजह होती हैं
इश्क़ की कोई बजह होती हैं प्यार क्या गजब होती हैं जब से देखा हैं सुना हैं तुझे सायद मोहब्बत तेरे जैसी ही होती हैं सच में तू मन मोहती �
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उड़ के अबर को छू लेना
उड़ के अबर को छू लेना या आशिया बही बना लेने मगर रुकना नहीं बही पे अपना एक और आश्मान अपनों के लिए बना लेना जब तक पा ना लो चाँद तारे और व
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तू जान थी कभी
तू जान थी कभी अरमान थी कभी मेरी बुझती सासों की तू चीराग थी कभी तुझे चाहा था इश्क़ से ज्यादा पर मैं समझ न पाया तेरा इरादा इस लिए तू इश�
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सूर्य को जलाना
चलो चले अंधकार मिटाने एक दिया उस घर में जलाने जिसे रौशन रौशन दान करता था चलो चले उसी अयोध्या में सूर्य को जलाना बस कुछ देर और सही श
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तू इश्क़ लगी विस्क लगी
तू इश्क़ लगी विस्क लगी सच कहु तो प्रीत लगी तेरी बातों के मिठास में ना जाने क्यों मित लगी जब से मिला हैं शब्दों से शब्द ना जाने क्यों �
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गुलाम होता हैं-समय के जुगनू एक दिन
समय के जुगनू एक दिन चमकेगा जरूर तक़दीर के अनमोल सितारा बनके तब ए हि लोग झुक के सलाम करेंगे ! ये तो अच्छा हुआ की वक्त बदल गया समय के छल
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गाँधी बाबा-सत्य अहिंसा और धरना से ही क्या आज़ादी पाए थे
गाँधी बाबा गाँधी बाबा क्या तुम ही सिर्फ लड़े थे क्या पल पल खौफ से मरे थे लहू से लथ पथ खुद को क्या कभी पाए थे ! सत्य अहिंसा और धरना से
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बहकाया-क्या ऐ जुल्म हैं
क्या ऐ जुल्म हैं की मैंने तुझे चाहा या फिर कसूर तेरा हैं जो तूने मुझे बहकाया ! तेरी चाहत में मैं मसगुल हूँ तेरे इश्क़ में ग़ुम हूँ पर �
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जिद हैं तो हैं-तुझे पा लेने की
जिद हैं तो हैं तुझे पा लेने की अपना बना लेने की धड़कनो में बसा लेने की हमसफ़र बना लेने की अब जिद हैं तो हैं माना की खूबसूरत हैं अजन्त�
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कौन थामें गा
ऐ जंगल सी लड़की दिल में बबंडर क्यों जगती खुद सांत रह के दिल में हलचल क्यों मचातीं हैं ! क्यों क्यों क्यों बेचैन करती हैं रूह मेरी बे �
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