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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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मेरे बातों में
जिस्म खामोश मगर मन बोलता हैं रूह चुप चुप फिर भी कुछ राज़ खोलता हैं! जान बे जान मगर तू पुकारता हैं तन बदल गया रात सा ढल गया आग में जल �
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पंख लगाते हैं
चलो मुस्कुराते हैं थोड़ा दिल जलाते हैं चलो न थोड़ा प्रेम में पंख लगाते हैं उड़ जायें दूर कही आशमा में छुप जायें चलो हम तुम मिल के एक परिव
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सच कहु तो अफ़शाना सी हैं
सच कहु तो अफ़शाना सी हैं अपनों में बेगाना सी हैं तू रोज़ बदलती हैं मौशम सी सच कहु तू परवाने सी हैं जलती तू है रात भर सांमा बनके जलन मुझ �
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क्या तू सच मुच् चाँद हैं
क्या तू सच मुच् चाँद हैं या यु ही समझ बैठा हूँ मैं अगर दाग़ हैं तो दिखा वार्ना जातां हु जाऊ क्या मैं तू अब तक कहा थी गुम मैं हर रोज़ आता
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अच्छा हैं
मेरी बातों का अफशान बन जाएं तो अच्छा हैं जज्बातों में पंख लग जाएं तो अच्छा हैं होठ खामोश मगर नैन उड़ जाएं तो अच्छा हैं साँस थम जाए�
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लिख
क्यों आँखें नम करती हैं बातें कम करती हैं अगर कहने से डरतो हैं तो हिमत जुटा और लिख आसुओ को बहने मत दे होठों को सिसकने से रोक जज्बात�
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जो तू भूल गया
जो हम छूट गए राह में क्या मिलेगे कभी अगर मिल भी गए तो क्या एक बनेगे कभी मिलना जरूर कुछ लम्हे बिताएंगे साथ साथ कुछ नगमे गुन गुनायें�
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क्या करे
क्या करे तुझ से इश्क़ हैं तो हैं क्या करे तू बात बात में रूठती हैं अब रूठती हैं तो रूठती हैं क्या करे जी करता हैं तुझे मना लू अपने आख�
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तू इधर इधर के बात न कर
तू इधर इधर के बात न कर ये बता तेरा इरादा क्या हैं ! तू हर बार दोसी बताता हैं मुझे लेकिन ये तो बता तेरा सच क्या हैं !! शहर के शहर हैं जल रह�
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तुझे क्या
नाम ले के मर जाए या पीके मर जाए तुझे क्या इश्क़ करू या न करू या भरपुर करू तुझे क्या तू सपने में आती हैं मेरी मगर मैं न आ ऊ तुझे क्या च�
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