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"उत्थान"
“सुबह तो रोज़ होती है… सूरज हर दिन उगता है… पर सवाल ये नहीं कि दिन कब निकला— सवाल ये है कि इंसान कब जागा? भीड़ में चलना आसान है, पर खुद
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नभ के राही
नभ के राही तु सुन मुझको ले चल उस पार जहाँ उड़ के तु जाता है लेने प्यार दुलार । नभ ही है वो घर तेरा नभ ही तेरी जान नभ में ही विचरण करें न
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उलझन एक शिक्षक की।
उलझन में पढ़ा शिक्षक परीक्षा नजदीक आए, पाठ्यक्रम को समय नियम से पूरा न कर पाए, लगी छुट्टी अतिवृष्टि की बच्चे स्कूल भूल जाए, निकाल समय श
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मां का आंचल अवर्णित है
धूप घाम में यह छाता है, रोने लगे तो रूमाल। मां का आंचल अवर्णित है, यही मां का कमाल।। नींद आयी तकिया बनकर, बेटे को सुलाया। मां ने आकर आं�
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बहाने बहुत हैं
बहाने बहुत हैं अपनी नाकामी छुपाने को, माचिस की एक तीली काफी है पूरा जहां जलाने को, अपने अंदर की चिंगारी को बुझने मत दो यारो, उम्मीद की
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समय सौदागर
समय, समय आने पर, सबकी गहराई नाप लेता है। समझ नहीं पाता कोई, समय जब चाप लेता है। समय सबका हिसाब, अपने आप लेता है। अर्श गिरे फ़र्श, समय �
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धोरां आळो देश आपणो
धोरां आळो देश आपणो" मोटो खाणो मोटो लाणो, मोटो है प्रदेश आपणो। भाईचारो भैळपणै रो, देखण जोगो मेळ आपणो। मारवाड़ री मारदड़ी रो, मगरतोड़ �
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महत्वाकांक्षाएं।
महत्वाकांक्षाएं । प्रातःकाल धुएं के समान मेरे पास के वातावरण में छाई हुई है हल्की सी ओश , ये ओश की बूंदे मोतियों के समान बिखरी हुई है �
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स्वप्न में
स्वप्न में तुम्हें आकर गुजर जाना था जीने की गुजरती सुधी की तरह मगर तुम बैठ गई वहां जैसे बैठता है चांद निशा की गोद में। स्वप्न में �
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“अभी टूटना मना है”
जब साँसें भी बोझ लगें, और हर कदम सज़ा लगें, तब समझ लेना— तू वहीं खड़ा है जहाँ से इतिहास बनता है। मंज़िल थकती नहीं, थकता सिर्फ़ हौसला ह�
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‘‘तुम भूल न! जाना 26 मुझे’’
कहता पच्चीस - छब्बीस से, तुम भूल न जाना दोस्त मुझे, मुझसे किए वादे लोगो ने, प्रेम,प्यार भाईचारे से। में आया एक दिन! खुशी उल्लास लिए, जाऊ�
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बापू की शेरनी
रानी का जौहर होता आत्म सम्मान के लिए शत्रु के आगे... कभी समर्पण, कभी पर्दापण, उससे बचाव के रास्ते, कहाँ से लाएंगी बेचारी ? रोज़ रोज़ स�
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